Just came across a very good Marathi poem / song, thanks to a Facebook friend. Loved it so much, that here is an attempt to translate it into Hindi.
Original Marathi:
Original Marathi:
मायेच्या हळव्या स्पर्शाने खुलते,
नात्यांच्या बंधात धुंद मोहरते
मन उधाण वार्याचे, गूज पावसाचे,
का होते बेभान, कसे गहिवरते!
आकाशी स्वप्नांच्या हरपून भान शिरते,
हुरहुरत्या सांजेला कधी एकटेच झुरते
सावरते, बावरते, घडते, अडखळते का पडते?
कधी आशेच्या हिंदोळ्यावर मन हे वेडे झुलते
मन तरंग होऊन पाण्यावरती फिरते
अन् क्षणात फिरुनी आभाळाला भिडते!
मन उधाण वार्याचे, गूज पावसाचे,
का होते बेभान, कसे गहिवरते!
रुणझुणते, गुणगुणते, कधी गुंतते, हरवते,
कधी गहिर्या डोळ्यांच्या डोहात पार बुडते
तळमळते सारखे बापडे नकळत का भरकटते?
कधी मोहाच्या चार क्षणांना मन हे वेडे भुलते!
जाणते जरी हे पुन्हापुन्हा का चुकते?
भाबडे तरी भासांच्या मागून पळते!
मन उधाण वार्याचे, गूज पावसाचे,
का होते बेभान, कसे गहिवरते!
My Hindi version:
ममताके रूहानी स्पर्शसे खिल उठता है, रिश्तोंके बंधनमें बेहोशीसे झूम उठता है
मन तूफानी हवाका, मन बारिशकी गूँज का
क्यूँ मचल जाता है यह इतना बेशुमार, क्यूँ भावुक हो जाता है यह बारबार
सपनोंके गगनमे (या गगनके सपनोमे?) पहुँच जाता है खुदको गँवाके
एक तनहा अकेली शाममें कभी, पाता है खुदको तड़पते
संभलता है, डरता है, बनता है, मचलता है, गिरता है
आशाओंके झुलेपर कभी, पगला यह झूलता है
फिरता है कभी लहरोंकी तरह पानी ही के ऊपर
फिर पलही में आ जाता है आकाशको चूम कर
मन तूफानी हवाका, मन बारिशकी गूँज का
रुमझुम गुनगुन कभी गाता है, कभी बुनता है जाल, कभी फंसता है खुद
अँखियोंके गहरे समंदरमें, जाता है कभी डूब
बेकस बेचारा ना जाने क्यूँ भटकता फिरता है
दो पल की तसल्ली के पीछे नादान भागता क्यूँ रहता है
जानते हुए भी की है गलत, गलतियाँ दोबारा करता ही रहता है
मासूम है बेचारा, मृगजलसे प्यास बुझाने की उम्मीद रखता है
मन तूफानी हवाका, मन बारिशकी गूँज का
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